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Homeopathic treatment of Skin Diseases in Hindi

Homeopathic treatment of Skin Diseases in Hindi : Homeopathic treatment of Skin Diseases explained here in Hindi language.

Homeopathic treatment of Skin Diseases

चर्म रोग का उपचार होम्योपैथी द्वारा कैसे करे – जानें चर्म रोग का उपचार होम्योपैथी द्वारा।

हमारे शरीर की त्वचा मुख्य रूप से मल-निष्कासक अंगों के अन्तर्गत आती हैं। त्वचा के माध्यम से प्रतिदिन पसीने के रूप में हमारे शरीर की अधिकांश गंदगी बाहर निकलती रहती है। जब तक हमारी त्वचा स्वस्थ रहती है तब तक शरीर के अन्दर किसी भी प्रकार की गंदगी नहीं रहती हैं। लेकिन जब किसी कारण से यह अस्वस्थ हो जाती है तब इसके छिद्र बंद हो जाते हैं या शरीर में गंदगी का भार इतना अधिक बढ़ जाता है कि वह इस अंग द्वारा बाहर नहीं निकल पाती तो प्रकृति शरीर को मल-भार से मुक्त करने के लिए बहुत से रोग उत्पन्न कर देती है। जिससे यह गंदगी शरीर के बाहर निकलने लगती है। ये रोग इस प्रकार हैं- खाज-खुजली, दाद, फोड़े-फुन्सियां, उकवात, पामा, छाजन, कुष्ठ, चेचक तथा कण्ठमाला आदि। ये सभी चर्म रोग होते हैं।

चर्म रोग के लक्षण-
इस रोग से पीड़ित रोगी की त्वचा पर सूजन हो जाती है तथा उसके फोड़े-फुंसियां निकलने लगता है। रोगी व्यक्ति को खुजली तथा दाद हो जाता है और उसके शरीर पर छोटे-छोटे लाल या पीले दाने निकल आते हैं।
त्वचा खुरदुरी हो जाती है और त्वचा में दरार पड़ जाती है

चर्म रोग होने का कारण:-
चर्म रोग होने का सबसे प्रमुख कारण शरीर में दूषित द्रव्य का जमा हो जाना होता है।
शरीर के अन्दर खराबी और गंदगी के कारण
चर्म रोग भूख से अधिक भोजन करने, संतुलित भोजन न करने, उचित तथा नियमित व्यायाम न करने, आराम न करने, अच्छी तरह से नींद न लेने के कारण होता है।
चाय-कॉफी तथा नशीली वस्तुओं का अधिक सेवन करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
दूषित भोजन का सेवन करने के कारण भी चर्म रोग हो जाते हैं।
कब्ज, सिर में दर्द, पेचिश आदि अन्य रोगों के कारण भी चर्म रोग हो सकते हैं।
अधिक गर्म तथा ठंडे मौसम के कारण भी चर्म रोग हो जाते हैं।
पाचन क्रिया तथा यकृत में खराबी आ जाने के कारण चर्म रोग हो जाते हैं।
पेट में कीड़ें, शरीर की अच्छी तरह से सफाई न करने के कारण भी चर्म रोग हो जाते हैं।
गीले वस्त्र तथा अधिक गर्म वस्त्र पहनने के कारण भी चर्म रोग हो जाते हैं।
मानसिक तनाव चिंता के कारण भी चर्म रोग हो सकते हैं।
रोगी व्यक्ति के वस्त्रों को पहनने तथा उसके द्वारा इस्तेमाल की गई चीजों का उपयोग करने से भी चर्म रोग हो जाते हैं।

जानते है चर्म रोग के लिए होम्योपैथिक उपचार
Psorinum 200 की ५ बुँदे, १०-१० मिनट के अंतर से दिन में ३ बार लें, इस दवा को आपको हफ्ते में एक बार ही लेना हैं
Bio-Combination 20 की ४ गोली दिन में ३ बार (४ गोली सवेरे, ४ गोली दिन में, ४ गोली शाम को)
Adel 20, की 15-20 बुँदे, दिन में ३ बार (15-20 बुँदे सवेरे, 15-20 बुँदे दिन में, 15-20 बुँदे शाम को) आधे कप पानी में मिलते हुए लें.
इसके साथ ही किसी अन्य व्यक्ति का उपयोग किया सामान जैसे तौलिया उपयोग में न लाये।

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Chechak

Smallpox

चेचक जब चेचक का रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो इस रोग को ठीक होने में 10-15 दिन लग जाते हैं। लेकिन इस रोग में चेहरे पर जो दाग पड़ जाते हैं उसे ठीक होने में लगभग 5-6 महीने का समय लग जाता है। यह रोग अधिकतर बसन्त ऋतु तथा ग्रीष्मकाल में होता है। ये रोग वेरीसेल्ला जोस्टर नाम के वायरस से होता हैं. इस दौरान व्यक्ति के शरीर में काले धब्बे पड़ जाते हैं और बुखार होता हैं साथ ही दर्द भी होता हैं . ये बीमारी एक इंसान से दूसरे इंसान को आसानी से फैल सकती हैं. ये रोग किसी भी उम्र के व्यक्ति व बच्चों को हो सकता हैं.
चेचक के लक्षण
चेचक होने पर कुछ निम्न लक्षण रोगी में देखे जाते हैं :-
खुजली
जलन व दर्द
शरीर में लाल दाने
थकान
उल्टी आना
तेज बुखार
सिर में दर्द
बैचनी आदि लक्षण चेचक के रोगी में मिलते हैं.

चेचक के कारण
ये रोग वेरीसेल्ला जोस्टर नाम के वायरस से होता हैं.
चेचक एक रोगी व्यक्ति से दूसरे रोगी व्यक्ति को संक्रमित हो सकता हैं.
चेचक के रोगी के वस्तु का उपयोग करने के कारण जैसे रोगी व्यक्ति के कपड़ो का इस्तेमाल करना आदि
जानते हैं चेचक के लिए होम्योपैथिक उपचार
Variolinum 200 की ५ बुँदे, दिन में ३ बार , ५ दिन तक दें (५ साल से बड़े व्यक्ति को) यदि ५ साल से छोटा बच्चा है तो २ बुँदे, दिन में ३ बार, ( ५ दिन तक )
साथ में Bio-Combination 14 की 4 गोली सवेरे, ४ गोली दिन में और ४ गोली शाम को,
इन दवाओं को लेने पर आपको चेचक में लाभ मिलेगा, साथ ही ज्यादा परेशानी होने पर तुरंत किसी होम्योपैथिक डॉक्टर से परामर्श लें.

migrane

Migraine

माइग्रेन, एक ऐसी बीमारी जिसके मरीज दुनियाभर में लगातार बढ़ते जा रहे हैं। हमारे देश में भी इसकी तादाद बढ़ती जा रही है। सबसे बड़ा कारण है भागदौड़ की जिंदगी। जो तनाव से तो भरपूर है पर उससे मुक्त होने के लिए हम कोई उपाय नहीं करते। बस यही सारी वजहें धीरे-धीरे माइग्रेन के रुप में बदलने लगती हैं।

माना जाता है कि जैसे ही आप सामान्य स्थिति से एकदम तनाव भरे माहौल में पहुंचते हैं तो सबसे पहले आपका सिर दर्द बढ़ता है। ब्लडप्रेशर हाई होने लगता है और लगातार ऐसी स्थितियां आपके सामने बनने लगे तो समझिए आप माइग्रेन के शिकार हो रहे हैं।

सिरदर्द से हर किसी का वास्ता है। ये एक ऐसा रोग है जिसके कई कारण हो सकते हैं। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे बेवजह सिरदर्द के शिकार हो गए हों। सिरदर्द का एक गंभीर रूप जो बार-बार या लगातार होता है, उसे माइग्रेन कहते हैं। माइग्रेन को आम बोलचाल की भाषा में अधकपारी भी कहते हैं।

माइग्रेन के लक्षण

माइग्रेन मूल रूप से तो न्यूरोलॉजिकल समस्या है। इसमें रह-रह कर सिर में एक तरफ बहुत ही चुभन भरा दर्द होता है। ये कुछ घंटों से लेकर तीन दिन तक बना रहता है। इसमें सिरदर्द के साथ-साथ गैस्टिक, जी मिचलाने, उल्टी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।

आम तौर पर इसका शिकार होने पर सिर के आधे हिस्से में दर्द रहता है। जबकि आधा दर्द से मुक्त होता है। जिस हिस्से में दर्द होता है, उसकी भयावह चुभन भरी पीड़ा से आदमी ऐसा त्रस्त होता है कि सिर क्या बाकी शरीर का होना भी भूल जाता है।

इसके अलावा फोटोफोबिया यानी रोशनी से परेशानी और फोनोफोबिया यानी शोर से मुश्किल भी आम बात है। माइग्रेन से परेशान एक तिहाई लोगों को इसकी जद में आने का एहसास पहले से ही हो जाता है। पर्याप्त नींद न लेना, भूखे पेट रहना और पर्याप्त मात्रा में पानी न पीना जैसे कुछ छोटे-छोटे कारणों से भी आपको माइग्रेन की शिकायत हो सकती है।

माइग्रेन के कारण

माइग्रेन के कारण कई हो सकते हैं। एक तरफ तो कुछ स्थितियां हैं और दूसरी तरफ कुछ रोग भी होते हैं।

ज्यादातर लोगों को भावनात्मक वजहों से माइग्रेन की दिक्कत होती है। इसीलिए जिन लोगों को हाई या लो ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और तनाव जैसी समस्याएं होती हैं उनके माइग्रेन से ग्रस्त होने की आशंका बढ़ जाती है। कई बार तो केवल इन्हीं कारणों से माइग्रेन हो जाता है। इसके अलावा हैंगओवर, किसी तरह का संक्रमण और शरीर में विषैले तत्वों का जमाव भी इसकी वजह हो सकता है।

एलर्जी के कारण और अलग-अलग लोगों में एलर्जी के अलग-अलग कारण हो सकते हैं। कुछ लोगों के लिए खाने-पीने की चीजें भी एलर्जी का कारण बन जाती हैं। कुछ लोगों को दूध और उससे बनी चीजें खाने से एलर्जी होती है तो कुछ के लिए साग-सब्जी एलर्जी का कारण हो सकती है। किसी को धूल से एलर्जी होती है तो किसी को धुएं से। इसलिए अगर आपको पता हो कि आपको किन चीजों से एलर्जी है तो उनसे बच कर रहें।

माइग्रेन के लिए होम्योपैथिक उपचार
Natrum Mur. 30 की ५ बुँदे, दिन में ३ बार ७ दिन तक लें
Spigelia 30 की ५ बुँदे , दिन में ३ बार इसे भी आप ७ दिन के लिए लें
Blooume 25 की 20 बुँदे दिन में ३ बार लें, इसे आपको आधे कप पानी में मिलते हुए लेना हैं,
साथ में Bio-Combination 12 की ४ गोली सवेरे, ४ गोली दिन में, और ४ गोली शाम को लें.

इन दवाओं का बताई गयी मात्रा में सेवन कर आप माइग्रेन की समस्या से लाभ पा सकते हैं.

dengu

Dengue

डेंगू एक बीमारी हैं जो एडीज इजिप्टी मच्छरों के काटने से होती है। इस रोग में तेज बुखार के साथ शरीर के उभरे चकत्तों से खून रिसता हैं। डेंगू बुखार धीरे-धीरे एक महामारी के रूप में फैल रहा है। यह ज्यादातर शहरी क्षेत्र में फैलता है। यदि डेंगू बुखार के लक्षण शुरूआत में पता चल जाएं तो इस बीमारी से बचा जा सकता है। आइये जानते हैं डेंगू को किस तरह से पहचाना जा सकता है। डेंगू से बचने के लिये आपको मादा एडीज इजिप्टी मच्छर से बचना पडेगा, इसको पहचानने के लिये देखिये कि इनके शरीर पर चीते जैसी धारियां तो नहीं हैं। ये ज्यादातर शरीर पर घुटने के ऊपर हमला करते हैं।

लक्षण

ऎसे में ठंड लगती है और तेज बुखार होता है। शरीर पर लाल चकते भी बन जाते है जो सबसे पहले पैरों पे फिर छाती पर तथा कभी कभी सारे शरीर पर फैल जाते है।

पेट खराब हो जाना, उसमें दर्द होना, दस्त लगना, ब्लेडर की समस्या, लगातर चक्कर आना, भूख ना लगना। रक्त मे प्लेटलेटस की संख्या कम हो जाना और नब्ज का दबाव कम होना 20 मिमी एच जी दबाव से लगातार सिरदर्द, चक्कर आना, भूख ना लगना।

खूनी द्स्त लगना और खून की उल्टी आना जब डेंगूहैमरेज ज्वर होता है तो ज्वर बहुत तेज हो जाता है रक्तस्त्राव शुरू हो जाता है, रक्त की कमी हो जाती है, थ्रोम्बोसाटोपेनिया हो जाता है, कुछ मामलों में तो मृत्यु हो जाती है।

जानते हैं डेंगू के लिए कुछ होम्योपैथिक दवाइयां :
Eupatorium Per. की २ से ३ बुँदे, दिन में ३-६ बार लें
Carica papaya Q की १०-१५ बुँदे दिन में ३-६ बार लें
Ocimum San., १०-१५ बुँदे दिन में ३-६ बार
Cinchona Q की की १०-१५ बुँदे दिन में ३ बार लें
Dengumar टॉनिक की २.५ ml , दिन में ३ बार लें

इन दवाओं को लेने के साथ साथ आप गिलोई का सेवन करें और साथ ही अपने आस पास साफ़ सफाई बनाये रखे.

sleepness

Sleeplessness

यदि हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए हम अपने अच्छे खान-पान पर, व्यायाम परए काम पर ध्यान देते है उसी तरह हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमरा अच्छे से पूरी नींद लेना भी बहुत जरुरी है। हमारा यह कहना गलत नहीं होगा कि अच्छे भोजन का संबंध अच्छी नींद से है और अच्छी नींद का संबंध सुंदरता से। गहरी नींद आपको खूबसूरत बनाती हैं। नींद न आना एक बीमारी है। इससे प्रभावित व्यक्ति ठीक से सो नहीं पाता है। वह थोड़ी-सी आवाज या रोशनी से जग जाता है, जिसका उसकी सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

हमारी अच्छी सेहत के लिए हमारी नींद का पूरा होना जरुरी है। कुछ लोग नींद न आने के कारण नींद की गोलियों का सेवन करते है, जो कि स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसानदायक हो सकता है। अच्छी नींद लेने से शारीरिक एवं मानसिक थकान दूर होती है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके अच्छे स्वास्थ्य के लिए कम से कम 7.8 घंटे सोना जरुरी होता है। अच्छी नींद आने के बाद व्यक्ति तरोताजा महसूस करता है, साथ ही उसे नई स्फूर्ति का एहसास होता है।

नींद न आने के कारण

ऐसे कई कारण होते हैं जिससे हम अपनी पूरी नींद नहीं ले पाते है और इसी कारण सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ने लगता है।
नींद ना आने के कुछ सामान्य कारण है :
मानसिक तनाव व अधिक क्रोध,
चिंतन करना,
अधिक उत्तेजना,
कब्ज,
धूम्रपान व नशीले प्रदार्थ का सेवन
चाय-कॉफी का अत्यधिक सेवन,
आवश्यकता से कम या अधिक खाना या गरिष्ठ मसालेदार भोजन का सेवन करना।

नींद ना आने के लक्षण :

दिन में सुस्ती आना
थकान महसूस करना
नींद का बार बार टूट जाना
चिड़चिड़ापन आदि.

नींद न आने के लिए होम्योपैथिक उपचार

नींद न आने पर कुछ होम्योपैथिक दवाओं का सेवन कर आप अनिंद्रा में लाभ पा सकते हैं
Coffea Cruda 200 की २ बुँदे दिन में ३ बार लें, (२ बुँदे सवेरे, २ बुँदे दिन में , २ बुँदे शाम को )
Omeo Sleep Drop की २० बुँदे दिन में ३ बार लें (२० बुँदे सवेरे, २० बुँदे दिन में, २० बुँदे शाम को )
इन दवाओं को लेने के साथ ही खूब पानी का सेवन करें और पोषण युक्त आहार लें , साथ ही व्यायाम करें।

swineflu

Swine flu treatment

स्वाइन फ्लू श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारी है, जो ए टाइप के इनफ्लुएंजा वायरस से होती है। यह वायरस एच1 एन1 के नाम से जाना जाता है और मौसमी फ्लू में भी यह वायरस सक्रिय होता है। 2009 में जो स्वाइन फ्लू हुआ था, उसके मुकाबले इस बार का स्वाइन फ्लू कम पावरफुल है, हालांकि उसके वायरस ने इस बार स्ट्रेन बदल लिया है यानी पिछली बार के वायरस से इस बार का वायरस अलग है। जब आप खांसते या छींकते हैं तो हवा में या जमीन पर या जिस भी सतह पर थूक या मुंह और नाक से निकले द्रव कण गिरते हैं, वह वायरस की चपेट में आ जाता है। यह कण हवा के द्वारा या किसी के छूने से दूसरे व्यक्ति के शरीर में मुंह या नाक के जरिए प्रवेश कर जाते हैं। मसलन, दरवाजे, फोन, कीबोर्ड या रिमोट कंट्रोल के जरिए भी यह वायरस फैल सकते हैं, अगर इन चीजों का इस्तेमाल किसी संक्रमित व्यक्ति ने किया हो। नॉर्मल फ्लू से कैसे अलग सामान्य फ्लू और स्वाइन फ्लू के वायरस में एक फर्क होता है। स्वाइन फ्लू के वायरस में चिड़ियों, सूअरों और इंसानों में पाया जाने वाला जेनेटिक मटीरियल भी होता है। सामान्य फ्लू और स्वाइन फ्लू के लक्षण एक जैसे ही होते हैं, लेकिन स्वाइन फ्लू में यह देखा जाता है कि जुकाम बहुत तेज होता है। नाक ज्यादा बहती है। पीसीआर टेस्ट के माध्यम से ही यह पता चलता है कि किसी को स्वाइन फ्लू है।

स्वाइन फ्लू के लक्षण
नाक का लगातार बहना, छींक आना, नाक जाम होना।
मांसपेशियां में दर्द या अकड़न महसूस करना।
सिर में भयानक दर्द।
कफ और कोल्ड, लगातार खांसी आना।
उनींदे रहना, बहुत ज्यादा थकान महसूस होना।
बुखार होना, दवा खाने के बाद भी बुखार का लगातार बढ़ना।
गले में खराश होना और इसका लगातार बढ़ते जाना।

स्वाइन फ्लू के लिए होम्योपैथिक उपचार
स्वाइन फ्लू होने पर होमियोपैथी की इन दवाओं का सेवन करें, साथ ही कही भी बाहर जाने पर फेस मास्क का प्रयोग करें और ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आने से बचे जिसे स्वाइन फ्लू हों, जानते हैं स्वाइन फ्लू के लिए होम्योपैथिक दवाएं :-

Arsenicum Album 200ch की ५ बुँदे, दिन में ३ बार लें (५ बुँदे सवेरे, ५ बुँदे दिन में , ५ बुँदे शाम को )
Swainil की २० बुँदे, दिन में ३ बार ( २० बुँदे सवेरे, २० बुँदे दिन में , २० बुँदे शाम को )

इन दवाओं के सेवन से आपको स्वाइन फ्लू में लाभ मिलेगा।

dama

Allergy Bronchitis

आस्थमा जिसे दमा भी कहा जाता हैं, ये श्वसन तंत्र की बीमारी है जिसके कारण सांस लेना मुश्किल हो जाता है। क्योंकि श्वसन मार्ग में सूजन आ जाने के कारण वह संकुचित हो जाती है। इस कारण छोटी-छोटी सांस लेनी पड़ती है, छाती मे कसाव जैसा महसूस होता है, सांस फूलने लगती है और बार-बार खांसी आती है। इस बीमारी के होने का विशेष उम्र बंधन नहीं होता है। किसी भी उम्र में कभी भी ये बीमारी हो सकती है। आम तौर पर अगर परिवार में आनुवांशिकता के तौर पर अस्थमा की बीमारी है तो इसके होने की संभावना बढ़ जाती है। अस्थमा कभी भी ठीक नहीं हो सकता है लेकिन कई प्रकार के ट्रीटमेंट के द्वारा इसके लक्षणों को नियंत्रण में लाया जा सकता है या बेहतर रहने की कोशिश की जा सकती है। फेफड़ों में हवा के प्रवाह में रुकावट होने पर अस्थमा अटैक होता है।

अस्थमा के कारण –
अस्थमा के कई कारण है, जानते हैं कुछ सामान्य कारण :

अधिक दवाओं का सेवन
किसी गंभीर बीमारी के कारण
एलर्जी
वायु प्रदूषण
धूम्रपान और तंबाकू
श्वसन संक्रमण
जेनेटिक्स (आनुवांशिक)
मौसम के कारण
मोटापा
तनाव

अस्थमा (दमा) के लक्षण –

अस्थमा के कुछ सामान्य लक्षण निम्न हैं :-

खाँसी
घरघराहट
साँस लेने में तकलीफ
सीने में जकड़न या दर्द
लगातार सर्दी और खांसी
नींद में बेचैनी
थकान

अस्थमा के लिए कुछ होम्योपैथिक दवाएं :
Arsenicum Album 30ch की 2-2 बुँदे, दिन में 3 बार ( २ बुँदे सवेरे, २ बुँदे दिन में, २ बुँदे शाम को )
Blatta Orientalis Q की २० बुँदे, दिन में ३ बार आधे कप गुनगुने पानी के साथ (२० बुँदे सवेरे, २० बुँदे दिन में, २० बुँदे शाम को )
ADEL 10 की १५-२० बुँदे, दिन में ३ बार आधे कप गुनगुने पानी के साथ (२० बुँदे सवेरे, २० बुँदे दिन में, २० बुँदे शाम को )
साथ ही तली भुनी चीज़ो का सेवन न करें और ज्यादा मसालेदार खाना न खाये, भाँप लें और व्यायाम या योग करें ।

Sun Stokes

लू लगाना
गर्मी के मौसम में तापमान बढ़ते ही लू लगने या हीटस्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में तापमान बढ़ना, शरीर में पानी की कमी होना, सिर भारी होना, आंखों में जलन, खून गर्म होना, बुखार, बेहोशी आदि समस्याएं हो सकती हैं। कई बार खून की गति का तेल होना एवं सांस की गति का बदलना एवं शरीर में ऐंठन होना काफी खतरनाक हो जाता है। इससे रोगी की जान भी जा सकती है। जब मनुष्य का शरीर अपनी क्षमता से अधिक गर्म हो जाता है तो इस अवस्था को लू लगना कहते हैं। लू लगने के कारण रोगी के शरीर में पानी की कमी भी हो जाती है जिसके कारण उसके शरीर में कई प्रकार की अन्य बीमारियां भी हो जाती है। इस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से इलाज किया जा सकता है।
लू लगने के लक्षण-
इस रोग के कारण व्यक्ति का शरीर गर्म तथा सुस्त हो जाता है। रोगी को ऐसा लगता है कि उसके शरीर में काम करने की ताकत नहीं रही हैं।
इस रोग के कारण रोगी की आंखे भी गर्म हो जाती हैं जिसके कारण उसकी आंखों से पानी निकलता रहता है।
शरीर में पानी की कमी हो जाती हैं
शरीर में कमजोरी व ऐठन
लू लगने के कारण-
यह रोग व्यक्ति को अधिक देर तक धूप में रहने के कारण तथा अधिक हवा के सम्पर्क में रहने के कारण
लू लगने का होम्योपैथिक उपचार
लू लगने पर Glonoinum 30 की २ बुँदे, दिन में ३ बार १०-१० मिनट के अंतर से लें
Natrum Muriaticum की २ बुँदे दिन में ३ बार लें, (२ बुँदे सवेरे, २ बुँदे दिन में, २ बुँदे शाम को )
Natrum Mur 6x, की ४ गोली दिन में ३ बार लें (४ गोली सवेरे, ४ गोली दिन में, ४ गोली शाम को)
इन दवाओं को लेने के साथ साथ खूब पानी पिए और धुप में न जाये।
ध्यान दे – दवाओं का सेवन बताई गयी विधि और मात्रा में ही करें, आप किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त हैं तो दवाओं का उपयोग करने से पूर्व अपने निकटतम विश्वसनीय होमोपथिक विशेषज्ञ से जरुर परामर्श कर लें।

Prostate Enlargement

प्रोस्टेट पुरुषों में पाई जाने वाली एक ग्रंथि है, यह रोग पुरुषों में ही होता है क्योंकि पुरुष ग्रंथि स्त्रियों में नहीं होती है केवल पुरुषों में होती है। पुरुष में यह ग्रंथि मूत्राशय की ग्रीवा तथा मूत्रमार्ग के ऊपरी भाग को चारों तरफ से घेरकर रखती है। इस ग्रंथि के द्वारा सफेद, लिसलिसा तथा गाढ़ा स्राव निकलता है। जब पुरुष उत्तेजित होता है तो उस समय शुक्राणु प्रोस्टेट में पहुंच जाते हैं। यह लिसलिसा पदार्थ इन शुक्राणुओं को जीवित रखने और बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब यह ग्रंथि अधिक बढ़ जाती है तो मूत्राशय तथा मूत्रमार्ग की क्रियाओं में बाधा उत्पन्न होती है।

पुरुष ग्रंथि बढ़ने का लक्षण:-
इस रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में कई बार पेशाब करने के लिए उठना पड़ता है। रोगी को एक बार में पेशाब पूरा नहीं आता इसलिए उसे पेशाब बार-बार करने जाना पड़ता है।
जब पुरुषों की पुरुष ग्रंथि बढ़ जाती है तो उस रोगी के पेशाब की धार पतली हो जाती है तथा पेशाब कम और रुक-रुक कर आता है।
रोगी व्यक्ति का पेशाब बूंद-बूंद करके आने लगता है।इस रोग से पीड़ित रोगी पेशाब तथा शौच को रोकने में असमर्थ होता है।
रोगी को सिर में दर्द, घबराहट, थकान, चिड़चिड़ापन, लिंग का ढीला हो जाना तथा अधिक कमजोरी महसूस होना आदि परेशानियां होने लगती हैं।

पुरुष ग्रंथि के अधिक बढ़ने के कारण:-
गलत तरीके के खान-पान तथा दूषित भोजन व अधिक मसालेदार भोजन का सेवन करने से पुरुष ग्रंथि के अधिक बढ़ने का रोग हो जाता है।
मानसिक तनाव अधिक होने, अधिक चिंता करने तथा क्रोध करने के कारण पुरुष ग्रंथि का अधिक बढ़ने का रोग हो सकता है।
नशीले पदार्थों व शराब का अधिक सेवन करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
पेट में कब्ज बनने के कारण भी पुरुष ग्रंथि बढ़ जाती है।मूत्र तथा शौच की गति को रोकने के कारण भी पुरुष ग्रंथि अधिक बढ़ सकती है।
लगातार लम्बे समय तक बैठने का कार्य करने से व्यक्ति के बस्ति प्रदेश पर बोझ पड़ता है जिसके कारण इस ग्रंथि में सूजन हो जाती है और यह रोग व्यक्ति को हो जाता है।
प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने का होम्योपैथिक उपचार
इस रोग पर Conium Maculatum 30ch की दो ड्राम गोली बनवा लें ,इसकी ४ गोली दिन में ३ बार लें (४ गोली सवेरे, ४ गोली दिन में , ४ गोली शाम को )
Sabal Pentarkan की २० बुँदे दिन में तीन बार (२० बुँदे सवेरे, २० बुँदे दिन में , २० बुँदे शाम को )आधे कप पानी में मिला कर लें.
dilution Eupatorium purp 30 को २ ड्राम बनवा लें और इसकी ४ गोली दिन में ३ बार लें , (४ गोली सवेरे, ४ गोली दिन में , ४ गोली शाम को )
ध्यान दे – दवाओं का सेवन बताई गयी विधि और मात्रा में ही करें, आप किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त हैं तो दवाओं का उपयोग करने से पूर्व अपने निकटतम विश्वसनीय होमोपथिक विशेषज्ञ से जरुर परामर्श कर लें।

Pyorrhea

पायरिया
दांतों का एक बहुत ही प्रचलित रोग है पायरिया। पायरिया दाँतों की एक गंभीर बीमारी होती है जो दाँतों के आसपास की मांसपेशियों को संक्रमित करके उन्हें हानि पहुँचाती है। यह बीमारी स्वास्थ्य से जुड़े अनेक कारणों से होती है, और सिर्फ दांतों से जुड़ी समस्याओं तक सीमित नहीं होतीं। यह बीमारी दाँतों और मसूड़ों पर निर्मित हो रहे जीवाणुओं के कारण होती है।दांतों की साफ सफाई में कमी होने से जो बीमारी सबसे जल्दी होती है वो है पायरिया। सांसों की बदबू, मसूड़ों में खून और दूसरी तरह की कई परेशानियां। जाड़े के मौसम में पायरिया की वजह से ठंडा पानी पीना मुहाल हो जाता है। पायरिया होने पर दांतों को सपोर्ट करने वाले जॉ बोन को नुकसान पहुंचता है। पायरिया का सही समय पर इलाज न किया जाये तो दांत ढीले होकर गिरने लगते हैं
पायरिया के कारण:
असल में मुंह में 700 किस्म के बैक्टीरिया होते हैं। इनकी संख्या करोड़ों में होती है। अगर समय पर मुंह, दांत और जीभ की साफ-सफाई नहीं की जाए तो ये बैक्टीरिया दांतों और मसूड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं और इस कारण पायरिया हो जाता हैं ।
गलत खान पान के कारण भी पायरिया होता हैं।
कब्ज के कारण।
लि‍वर की खराबी के कारण रक्त में अम्लता बढ़ जाती है।
पायरिया के लक्षण
नियमित आहार और दाँतों की रक्षा में रुक्षांस की कमी या पूर्ण रूप से अभाव,
दाँतों में खान पान के कण अटकना और दाँतों का सड़ना,
दाँतों पर अत्यधिक मैल जमना,
मुँह से दुर्गन्ध का निकलना और मुँह में अरुचिकर स्वाद का निर्माण होना,
जीवाणुओं का पसरण, मसूड़ों में जलन का एहसास होना और छालों का निर्माण होना, जरा सा छूने पर भी मसूड़ों से रक्तस्राव होना इत्यादि पायरिया के लक्षण होते हैं।
पायरिया का होम्योपैथिक उपचार
Pyrogenium 30, की ४ गोली दिन में ३ बार (४ गोली सवेरे, ४ गोली दिन में, ४ गोली शाम को)
Bio-Combination 18, की ४ गोली दिन में ३ बार (४ गोली सवेरे, ४ गोली दिन में, ४ गोली शाम को)
Hekla Lava 3x, की २ गोली दिन में ३ बार (२ गोली सवेरे, २ गोली दिन में, २ गोली शाम को).
ध्यान दे – दवाओं का सेवन बताई गयी विधि और मात्रा में ही करें, आप किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त हैं तो दवाओं का उपयोग करने से पूर्व अपने निकटतम विश्वसनीय होमोपथिक विशेषज्ञ से जरुर परामर्श कर लें।