Homeopathic Treatment for Worms

पेट के कीड़े
पेट में कीड़ें होने पर रोगी के पेट में दर्द होता है बेचैनी होती है, गुदा के आस-पास के भाग में खुजली होती है। अतिसार तो कभी कब्ज की समस्या बनी रहती है। शरीर का वजन धीरे-धीरे घटने लगता है। स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो जाता है तथा जी मिचलाता है। पाकाशय तथा आंतों में तीन प्रकार के कीड़ें होते हैं- छोटी-छोटी सूत की तरह के कीड़ें (स्माल थीड वोर्मस) गोल लम्बी केंचुए की तरह के कीड़ें (लोंग राउण्ड वोर्मस) खूब लम्बे फीते की तरह के कीड़ें (टेप वोर्मस) छोटी-छोटी सूत की तरह के कीड़ें :- ये कीड़ें कई सारे एक साथ जमा होकर मलद्वार के पास रहते हैं। इनकी लम्बाई एक चौथाई इंच से एक इंच होती है। ये कभी मूलनली या योनि के द्वार में भी चले जाते हैं जिसके कारण से इन स्थानों में खुजली होती है तथा जलन होती है और धातु निकलता है।
ये कीड़ें यदि किसी रोगी में हो तो उसमें इस प्रकार के लक्षण दिखाई पड़ते हैं-
नाक का अगला भाग या गुदाद्वार में खुजली होती है, सांस लेने और छोड़ने पर बदबू आती है, मलत्याग करने पर अधिक परेशानी होती है, गुदाद्वार में बराबर खुजली होती रहती है, नींद न आना, नींद में दांत कड़मड़ाना आदि।
गोल लम्बी केंचुए की तरह के कीड़ें :- ये कीड़ें छोटी आंत में रहते हैं, ये देखने में सफेद होते हैं तथा इनकी लम्बाई चार से 12 इंच तक होती है। ये कभी पाकस्थली की राह में मुंह में आकर उल्टी के साथ बाहर निकल आते हैं। ये कभी-कभी मलत्याग करने पर मल के साथ भी निकल आते हैं। ये कीड़ें यदि किसी रोगी के शरीर में हैं तो उसमें इस प्रकार के लक्षण दिखाई पड़ते हैं- पेट फूलना और पेट में बहुत दर्द, दांत कड़मड़ाना, नींद में एकाएक चीख पड़ना, नाक के अगले भाग और गुदा में खुजली होना, पेट कड़ा और गर्म महसूस होना, शरीर दुबला तथा पतला, चेहरा पीला, आंव-मिला मल होना, आंखों की पुतली फैलना, चेहरा पीला पड़ जाना, कभी बहुत भूख, कभी अरुचि, सांस से बदबू आना, बेहोशी छाना, जी मिचलाना तथा मुंह में बराबर पानी भर आना आदि।
खूब लम्बे फीते की तरह के कीडें :- ये सफेद, चिपटे, गांठ-गाठं दार होते हैं, इनकी लम्बाई 30 फीट से 200 फीट तक होता है, ये कीड़ें भी छोटी आंत में रहते हैं। ये मनुष्य के शरीर में एक से ज्यादा नहीं रहते हैं। मल के साथ इन कीड़ों का कुछ अंश टुकड़े-टुकड़े में होकर निकलता है।
हुक वर्म (अंकुश कृमि) :- ये कृमि बड़ी आंत में पाये जाते हैं और इनके कारण रोगी को एनीमिया हो जाया करता है, तलवों में खुजली के साथ उद्भद निकलना और चिड़चिड़ापन होना आदि।
टेप वर्म (फीता कृमि ) ये भी ज्यादातर आंतों में पाए जाते हैं और दस मीटर तक लम्बे होते हैं। इन कीड़ों के प्रकोप के कारण से कमजोरी थकावट, ज्वर और अंधापन होने के लक्षण प्रकट हो सकते हैं।
एस्केरस (गोल कृमि) :- जब ये कीड़ें मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं तो रोगी की आवाज में सांय-सांय की ध्वनि आने लगती है। खांसी ज्वर, पाकाशय में दर्द होना तथा सांस लेने में दिक्कत आना आदि लक्षण इन कीड़ों के द्वारा हो जाते हैं।
थ्रेड वर्म (सूत कृमि) :- इन कृमि के कारण से गुदा में खुजली होती है, अधिकतर रात के समय में खुजली होती है, खांसी भी हो जाती है, सांस के साथ सांय-सांय की आवाज, अतिसार, मलद्वार में खुजली आदि लक्षण इनके द्वारा उत्पन्न हो सकते हैं।
जियार्डिया :- इन कृमि के कारण से रोगी को दस्त लग जाते हैं, पेट फूल जाता है, चिकना और बदबूदार मल आना, शरीर का वजन घटना आदि।
पेट में कीड़े होने के कारण :-
दूषित पानी व भोजन का सेवन करने, अधपका मांस खाने तथा अस्वस्थ पालतू पशुओं के साथ खेलने या रहने से पेट तथा आंतों में कई प्रकार के कीड़ें हो जाते हैं।
पेट की सफाई ठीक प्रकार से न होने या पाचन सम्बंधी गड़बड़ियां होने से पेट में कीड़ें हो जाते हैं ।
कान या नाक से स्राव होने की वजह से उसमें मक्खी घुसकर अंडा दे देती है यही अंडे फूटकर नाक या कान में कीड़ा पैदा कर देते है।
कच्चे फल-मूल, ज्यादा पके केले, सड़ी मछली, अधिक मीठा खाना, गंदे पदार्थों का भोजन में प्रयोग करने के कारणों से पेट में कीड़ें हो जाते हैं।
पेट के कीड़े होने के लक्षण
खाने का न पच पाना
दस्त का होना
कब्ज़ की शिकायत
खाना खाने के तुरन्त बाद मल का आ जाना
मल में बलगम तथा खून आना
पेट में दर्द तथा जलन
वजन और भूख समस्या
मांसपेशियों और जोड़ों की शिकायत
गैस और सूजन का अनुभव
बवासीर
शारीरिक कमजोरी
त्वचा सम्बंधित रोग और एलर्जी
शरीर में खुजली, सूजन आदि लक्षण पेट के कीड़े होने में देखे गए हैं ।
पेट के कीडों का होम्योपैथिक उपचार
Cina 1m की 5 बुँदे 10-10 मिनट के अंतर से, ३ बार , इस दवा को सप्ताह में एक बार लें
Helmisol drops, की २० बुँदे दिन में ३ बार आधे कप पानी के साथ मिला कर लें
R 56, २० बुँदे दिन में ३ बार लें
इन दवाओं को सही मात्रा व समय पर लेने से आपको पेट के कीड़ों से छुटकारा मिलेगा, साथ ही खाने में संतुलित आहार लें, खूब पानी पिए।

Varicose Veins

वैरिकोज वेन्‍स

पैर की नसों में मौजूद वाल्‍व, पैरों से रक्त नीचे से ऊपर हृदय की ओर ले जाने में मदद करते है। लेकिन इन वॉल्‍व के खराब होने पर रक्त ऊपर की ओर सही तरीके से नहीं चढ़ पाता और पैरों में ही जमा होता जाता है। इससे पैरों की नसें कमजोर होकर फैलने लगती हैं या फिर मुड़ जाती हैं, इसे वैरिकोज वेन्‍स की समस्‍या कहते हैं। इससे पैरों में दर्द, सूजन, बेचैनी, खुजली, भारीपन, थकान या छाले जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विस के अनुसार, वैरिकाज वेन्‍स 25 प्रतिशत महिलाओं और 10 प्रतिशत पुरुषों को प्रभावित करता हैं।

वेरिकोज वेन्स के लक्षण
नसों में सूजन
पैरो में भारीपन
खुजली
पैरो में दर्द
नसों का रंग लाल या नीला पड़ना
नसों से रक्तस्राव

वेरिकोज वैन्स के कारण

वैरिकोज वैन्स के वैसे तो कई कारण है जिनमे से कुछ मुख्य कारण है :
गर्भवस्ता के दौरान ये समस्या होना आम बात है
व्यायाम की कमी के कारण
मोटापे से पीड़ित व्यक्ति में ये समस्या देखने को मिलती है
बढ़ती उम्र जिस कारण नसों की लवचीलता काम हो जाती है
अनुवांशिकता भी वैरिकोज वेन्स का एक सामान्य कारण है

वैरीकोज वेन्स का होम्योपैथिक उपचार

Ruta g 30 की 5 बुँदे दिन में ३ बार लें,
Adel 44 की 20 बुँदे, दिन में ३ बार लें
Blooume 32 की 20 बुँदे, दिन में ३ बार लें

बताई गयी दवाओं से आपको वेरिकोज वेन्स में बेहद लाभ मिलेगा साथ ही व्यायाम करें और पर्याप्त मात्रा में पानी पिए।

Dog Bite

कुत्ते का काटना

आज-कल रोड पे आवारा कुत्तो का कहर देखने को मिलता है चलते चलते कब आपके पीछे कुत्ते पड़ जाये आप नहीं जान सकते कुत्ते के काटने का विष खतरनाक होता है। कुत्ते के काटने से कई तरह के संक्रमक रोग लग सकते हैं जिसमें इंसान पागल तक हो जाता है।
कुत्ते के काटने पर आप कुछ होम्योपैथिक दवाओं का इस्तेमाल कर, कुत्ते के काटने के संक्रमण से बच सकते है

कुत्तों के काटने के कारण
कुत्तों के काटने का वैसे तो कोई मुख्य कारण नहीं है ,बड़ों की तुलना में 5 से 9 साल के बच्चों को कुत्ते अधिक काटते हैं. अधिकतर उन घरों के ही बच्चों को कुत्ते काटते हैं जिन घरों में कुत्ते को पाला जाता हैं. ऐसा इसलिए होता हैं क्यूंकि अक्सर छोटे बच्चे खेल – खेल में उनकों ज्यादा परेशान कर देते हैं या चिढ़ाते , उनकी पूंछ को, कानों को बार – बार खीचते हैंऔर वो उन्हें काट लेते हैं. घर के पालतू कुत्ते बड़ों को या बच्चों को न पहचानने के कारण तथा घर की रखवाली करने के लिए काट लेते हैं. गलियों में घुमने वाले कुत्ते इसलिए काट लेते हैं क्यूंकि या तो वो पागल होते हैं या वो घायल होते हैं या राह चलते लोग उन्हें परेशान करने लगते है

कुत्ते के काटने के लक्षण
कुत्ते के काटने पर शरीर के जिस भाग पर कुत्ते ने कटा है. वो भाग पूरा लाल हो जाता हैं, कुत्ते के दांत बहुत ही नुकीले होते हैं जिससे उनके काटते ही खून निकलने लगता हैं तथा दर्द होता हैं।
जहाँ कुत्ते ने कटा हो वहां घाव हो जाता है।
जानते है कुत्ते के काटने के लिए होम्योपैथिक उपचार
कभी लापवाही के चलते या जाने अनजाने में या किसी कारण कुत्ता कभी किसी को काट ले तो होमियोपैथी की कुछ दवाओं का उपयोग कर आप आराम पा सकते है।
Hydrophobium , की २-२ बुँदे, दिन में ३-६ बार तक लें
और अगर कुत्ते के काटने में घाव हो गया हो तो ,Calendula officinalis Q को रुई से उस जगह पर लगाए
कुत्ते के काटने पर इन दवाओं को लेने से आपको जल्द आराम मिलेगा।

Fever Treatment

बुखार

जब शरीर का ताप बढ़ने को बुखार कहते हैं। शरीर के किसी भी अंश में जलन होने या किसी तरह का जहर खून के साथ मिल जाने पर बुखार हो जाता है ।
बुखार ३ तरह का बताया गया हैं :
जो बुखार एक बार ठीक होकर दुबारा से आ जाता है तो उसे सविराम ज्वर या विषम ज्वर कहते हैं।
जो ज्वर हमेशा बना रहता है और ठीक नहीं होता है उसे अविराम ज्वर कहते हैं।
जो बुखार घटते-घटते फिर से बढ़ जाता है, उसे स्वल्प-विराम ज्वर कहते हैं।

बुखार आने से हमे पता चलता हैं की हमारे शरीर के अंदर किसी प्रकार का संक्रमण हो गया है। शरीर का सामान्य तापक्रम 98.6 फारेनहाइट या 36 डिग्री सेंटीग्रेड होता है। शरीर का तापमान मुंह में या बगल में थर्मामीटर लगाकर नापा जा सकता है, लेकिन इन दोनों स्थानों के तापमान में लगभग एक डिग्री फारेनाहाइट का अंतर होता है।

कारण :-

बहुत ज्यादा परिश्रम करना, मासिकधर्म तथा डिम्ब क्षरण के समय, उच्चतापमान के वातावरण से, बैक्टीरिया, वायरस या फंगस का संक्रमण शरीर के किसी भाग में हो जाना आदि कारणों से बुखार होता है। बुखार कई प्रकार के रोगों के कारण भी होता है जैसे- कैंसर, आमवात, हारमोन में वृद्धि होना, थायराइड रोग, लू, चोटलगना आदि।

बुखार होने के लक्षण :-

बुखार होने का मुख्य लक्षण शरीर का ताप बढ़ना है परन्तु कई और लक्षण है, जिनसे आप बुखार का पता लगा सकते है :

मांसपेशियों में दर्द होना।
शरीर में कमजोरी महसूस होना।
सिर में दर्द होना।
कमर में दर्द होना।
सर्दी लगना
बेहोशीपन महसूस होना या कभी-कभी बेहोश हो जाना।
प्रलाप (बेहोशी में बुदबुदाना)।
त्वचा पर कई प्रकार की फुंसियां निकलना।
शरीर से पसीना आना।

बुखार के लिए होम्योपैथिक दवाइयां :
बुखार होने पर मरीज को होमियोपैथी की कुछ दवाये दे कर मरीज को ठीक किया जा सकता है। तो चलिए जानते है बुखार के लिए होम्योपैथिक दवाइयां :

Antipyrinum 30ch 2 बुँदे दिन में , तीन से छः बार,
अगले दिन से Acetanilidum की 2 बुँदे दिन में , तीन से छः बार,
Bio-Combination 11, 4 गोली दिन में , तीन बार (4 गोली सवेरे , 4 गोली दिन में, 4 गोली रात को )
बुखार से पीड़ित रोगी को शारीरिक और मानसिक श्रम से बचना चाहिए।
शरीर में पानी की कमी न हो इसके लिए तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए। रोगी को कार्बोनिक पेय, ठण्डे रस व फल जैसे ककड़ी, खीरे और केले का सेवन नहीं करना चाहिए।बुखार को कम करने के लिए माथे पर ठण्डी पटि्टयां लगानी चाहिए।अधिक बुखार होने पर पूरे शरीर को गीले कपड़े में लपेटने से लाभ मिलता है।बुखार से पीड़ित रोगी को हल्का और पौष्टिक भोजन करना चाहिए जिसमें सब्जियों का रस और सूप को जरूर शामिल करें ।

Face Warts

मस्से

मस्सा वायरस से प्रेरित स्किन ग्रोथ का प्रकार हैं। त्वचा पर पेपीलोमा वायरस के कारण छोटे खुरदरे कठोर गोल पिण्ड बन जाते हैं जिसे मस्सा कहते हैं। ये मस्से कई प्रकार के होते हैं। कुछ मस्से ऐसे होते हैं जो उत्पन्न होकर अपने आप एकाएक समाप्त हो जाते हैं। जब कोई रोगी मस्से को काट या फोड़ देता है तो उस मस्से का वायरस शरीर के अन्य स्थानों पर जाकर वहां भी मस्से बना देते हैं। कभी-कभी मस्से का वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति की त्वचा पर आकर उसकी त्वचा पर भी मस्से बना देते हैं।

मस्से के प्रकार
मस्से कई प्रकार के होते है, जिनमे से कुछ सामन्य प्रकार है :
सामान्‍य मस्‍सा, प्‍लांटार वार्ट्स,फ्लैट वार्ट्स, फिलिफ्रोम वार्ट्स, पेरींगुअल वार्ट्स, जननांग मस्‍सा

मस्सॊ का मुख्य कारण मानव (ह्यूमन) पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) होता है।

मस्सों के लक्षण :-
मस्सो के वैसे तो कई लक्षण देखे गए है, जिनमे से कुछ खास लक्षण है :
मांसपेशियों की वृद्धि से छोटा बम्प्स
हाथ-पैरों पर सफेद व गुलाबी रंग के मस्से हो जाते हैं जो कठोर व खुरदरे होते हैं।
मस्से छूने पर खुरदुरे लगते हैं।
कभी-कभी मस्से समूहों में उत्पन्न होते हैं जो अधिकतर भी गर्दन, चेहरे एवं छाती पर होते हैं।
कुछ लोगों के अंगुलियों व पैरों के नाखूनों के किनारों पर भी मस्से उभरे आते हैं।

मस्सों के लिए होम्योपैथिक उपचार

होमियोपैथी में मस्सों का कुशल उपचार संभव है तो चलिए जानते है मस्सों के लिए कुछ होम्योपैथिक दवाएं :

Causticum 200ch 2 2 बुँदे सवेरे
Acidum Nitricum 200, 2 बुँदे शाम को
Berberis Aquifolium Q, 10 बुँदे दिन में तीन बार , (10 बुँदे सवेरे , 10 बुँदे दिन में, 10 बुँदे शाम को )

इन दवाओं के उपयोग के साथ साथ, कुछ बाते ध्यान में रखे जैसे :
हाथ को नियमित रूप से धोते रहे , मस्से को ब्लेड या किसी भी चीज़ से छेड़े या कटे नहीं ।

Hiccups Treatment in Homeopathy

हिचकी का रोग अपने आप में कोई बहुत बड़ा रोग नहीं है लेकिन फिर भी हिचकी किसी भी इंसान को बहुत परेशान कर सकती है जैसे अगर भोजन करते समय हिचकी आना शुरू हो जाती है तो व्यक्ति का भोजन करना मुश्किल हो जाता है। छाती और पेट की मांसेपेशियां सिकुड़ने के कारण फेफड़े तेजी से हवा खिंचने लगते हैं और सांस लेने में दिक्कत होने लगती है, जिस कारण हिचकियां शुरू हो जाती है। कई बार गर्म खाने के एकदम बाद कुछ ठंडा खाने से भी हिचकी आना शुरू हो जाती हैं। हिचकी वैसे तो कुछ देर बाद अपने आप ही बंद हो जाती है लेकिन फिर भी अगर ये रोग पुराना हो जाए तो काफी भयंकर हो सकता है इसलिए समय पर ही इसकी चिकित्सा कर लेनी चाहिए।

कारण- हिचकी आने के रोग का अभी तक सही कारण तो पता नहीं चल पाया है
लेकिन हिचकी के कुछ देखे गए कारण है
ये अक्सर ज्यादा भोजन करने से,
शराब पीने से,
गुर्दें के खराब हो जाने से,
मधुमेह (डायबिटीज), आदि के कारण हो जाता है।

जानते है हिचकी के लिए होम्योपैथिक उपचार

Nux Vomica 30 की 5 बुँदे, रात को लें
Ginseng 30, की 2 बुँदे दिन में 3 बार लें (2 बुँदे सवेरे , 2 बुँदे दिन में ,2 बुँदे शाम को )
Kali Phosphoricum 6x की 4 गोली, दिन में तीन बार ( 4 गोली सवेरे, 4 गोली दिन में, 4 गोली शाम को )

हिचकी होने पर बताई गयी दवाओं को सही मात्रा में और सही समय लेने से हिचकी से आराम मिलता हैं । इसके साथ ही हिचकी आने पर एक गिलास पानी में शक्कर मिलाकर पीना चाहिए। हिचकी आने पर सांस को रोककर खाली घूंट निगल जाना चाहिए। हिचकी आने वाले व्यक्ति की कमर पर अचानक एक थपकी लगाकर उस पर ठण्डा पानी गिराकर उसको चौंका दें। बच्चों को हिचकी आने पर थोड़ा दूध या पानी पिलाने से हिचकी तुरंत ही बंद हो जाती है।

Epilepsy Treatment in Homeopathy

अपस्मार या मिर्गी एक तंत्रिकातंत्रीय विकार है, जिसमें रोगी को बार-बार दौरे पड़ते है। मस्तिष्क में किसी गड़बड़ी के कारण बार-बार दौरे पड़ने की समस्या हो जाती है। दौरे के समय व्यक्ति का दिमागी संतुलन पूरी तरह से गड़बड़ा जाता है और उसका शरीर लड़खड़ाने लगता है। इसका प्रभाव शरीर के किसी एक हिस्से पर देखने को मिल सकता है, जैसे चेहरे, हाथ या पैर पर। इन दौरों में तरह-तरह के लक्षण होते हैं, जैसे कि बेहोशी आना, गिर पड़ना, हाथ-पांव में झटके आना। मिर्गी किसी एक बीमारी का नाम नहीं है। अनेक बीमारियों में मिर्गी जैसे दौरे आ सकते हैं। मिर्गी के सभी मरीज एक जैसे भी नहीं होते। किसी की बीमारी मध्यम होती है, किसी की तेज। यह एक आम बीमारी है जो लगभग सौ लोगों में से एक को होती है। इनमें से आधों के दौरे रूके होते हैं और शेष आधों में दौरे आते हैं,जबकि उपचार जारी रहता है।

मिर्गी के कारण
मिर्गी के कई कारण हैं, जिनमे से कुछ कारण है :
ब्रेन ट्यूमर।
न्यूरोलॉजिकल डिज़ीज जैसे अल्जाइमर रोग।
जन्म के समय मस्तिष्क में पूर्ण रूप से ऑक्सिजन का आवागमन न होने पर।
दिमागी बुखार और इन्सेफेलाइटिस के इंफेक्शन से मस्तिष्क पर पड़ता है प्रभाव।
ब्रेन स्ट्रोक होने पर ब्लड वेसल्स को क्षति पहुँचती है।
सिर पर किसी प्रकार का चोट लगने के कारण।
जेनेटिक कंडिशन।
कार्बन मोनोऑक्साइड के विषाक्तता के कारण भी मिर्गी का रोग होता है।
ड्रग एडिक्शन और एन्टीडिप्रेसेन्ट के ज्यादा इस्तेमाल होने पर भी मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ सकता है।

मिर्गी के लक्षण
मिर्गी के मरीज में कई अलग अलग लक्षण देखे गए है , परन्तु कुछ आम लक्षण जो मिर्गी के मरीज में देखे जाते है वो है :
जीभ काटने और असंयम की प्रवृत्ति।
अचानक हाथ,पैर और चेहरे के मांसपेशियों में खिंचाव उत्पन्न होने लगता है।
मरीज़ या तो पूर्ण रूप से बेहोश हो जाता है या आंशिक रूप से मुर्छित होता है।
पेट में गड़बड़ी।
सर और आंख की पुतलियों में लगातार मूवमेंट होने लगता है।
मिर्गी के दौरे के बाद मरीज़ उलझन में होता है, नींद से बोझिल और थका हुआ महसूस करता है।

मिर्गी का होम्योपैथिक उपचार
मिर्गी के लिए होम्योपैथिक में उपचार उपलब्ध है, जानते है मिर्गी के लिए होम्योपैथिक दवाएं :
Aethusa 3, 2 बुँदे, दिन में तीन बार लें (2 बुँदे सवेरे, 2 बुँदे दिन में, 2 बुँदे रात को)
R 33 की 20 बुँदे , दिन में ३ बार लें , (20 बुँदे सवेरे, 20 बुँदे दिन में, 20 बुँदे रात को)
Bio-Combination 24 की 4 गोली, दिन में ३ बार लें, (4 गोली सवेरे, 4 गोली दिन में, 4 गोली रात को)
बताई गयी दवा को सही मात्रा और सही समय पर लें, आपको मिर्गी में फर्क जरूर महसूस होगा साथ ही पर्याप्त नींद और एक ही समय में सोने की आदत का पालन करें , तनाव से दूर रहे , व्यायाम करें और संतुलित आहार लें ।

best homeopathic doctor haldwani

Whooping Cough

Pertussis सूखी खाँसी होम्योपैथी चिकित्सा

कई बार तो खाँसी के दौरे के चलते हम उल्टी भी कर देते हैं, क्योंकि खाँसी का दबाव पेट पर भी पड़ता था। ऐसी खाँसी को काली खाँसी या सूखी खांसी भी कहा जाता है, जो श्वांस तंत्र में संक्रमण होने से होता है।

काली खाँसी किसी भी उम्र के लोगो को हो सकती है । कुछ दिनों बाद तीव्र खाँसी का दौरा पड़ने लगता है ।

काली खांसी का दूसरा नाम – पार्टुसिस है। साधारणत: 2 वर्ष के नीचे के बच्चों को ही यह बीमारी हुआ करती है।
अगर यह बीमारी एपिडेमिक हुई तो 8 वर्ष तक की उम्र तक भी आक्रमण कर सकती है।

यह बीमारी जीवन में सिर्फ एक बार होती है। हु‍पिंग कफ की तीन स्टेज या अवस्थाएँ हैं। –
1. कैटेरैल
2. कन्वसिव
3. क्रिटिकल

हुपिंग कफ में ब्रोंकाइटिस के सभी साउण्ड मौजूद रहते हैं। इसके प्रधान उपसर्ग-ब्रोंकोनिमोनिया, निमोनिया, एम्फाईसीमा इत्यादि हैं।
खसरा, चेचक, स्कार्लेटिना (आरक्त ज्वर) आदि रोगों के उपसर्ग में भी हुपिंग कफ होना है। इस रोग की साधारणतया पहचान आसान होती है। लगातार खाँसी, मुखमंडल लाल हो जाना, श्वास तेज चलना, बेचैनी बढ़ जाना तथा छाती में स्टेथेस्कोप या कान लगाकर सुनने पर धड़-धड़ की आवाज सुनाई पड़ती है।

सूखी खांसी के लिए होम्योपैथिक उपचार

सुखी खांसी के लिए होमेओपथी में कुशल उपचार संभव है, जानते हैं सुखी खांसी के लिए होम्योपैथिक दवाइयाँ ।
Justicia Q, 10 -15 बुँदे, दिन में 3 बार (10 -15 बुँदे सवेरे ,10 -15 बुँदे दिन में,10 -15 बुँदे शाम को )।
Aconite 2 बुँदे , 10-10 मिनट के अंतर से, दिन में 2 बार ।
Drosera Rotundifolia Q , 2-5 बुँदे , दिन में 3 बार (2-5 बुँदे सवेरे ,2-5 बुँदे दिन में,2-5 बुँदे शाम को)।

बताई गयी दवाओं का सही मात्रा में और सही समय में प्रयोग कर आप काली खांसी से निजात पा सकते हैं ।

best homeopathic doctor haldwani

Mental Stress

होम्योपैथी से तनाव का इलाज
आज के युग में तनाव, चिंता अवसाद, इत्यादि आम समस्याएं बन गई हैं और आज लोगों को जिस तरह की जीवन शैली अपनानी पड़ती है वह इन समस्याओं को और बढ़ावा देता है। होम्योपैथिक उपचार आपकी तंत्रिका प्रणाली को दुरुस्त करके तनाव, चिंता, अवसाद इत्यादि समस्याओं से मुक्ति दिलाता है साथ हीं साथ आपकी भावनाओं से जुडी समस्याओं में भी काफी लाभ पहुंचाता है एवं आपको दुःख से उबरने की शक्ति प्रदान करता है।
मानसिक समस्याओं के शुरूआती लक्षणों को पहचानना जरूरी है जिससे की आप जल्द से जल्द उनका उपचार शुरू कर सकें। चिड़चिड़ापन,अनिद्रा, भय या अपराध की भावना से ग्रस्त होकर दुखी रहना; ये सब मानसिक रोग होने के संकेत हैं जिनका शीघ्र उपचार किया जाना चाहिए। ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है की अवसाद इत्यादि जैसी बीमारियाँ पुरानी मानसिक बीमारी हो चुकी होती हैं जिनका लम्बी अवधि तक उपचार चल सकता है।
जानते है तनाव के लक्षण
हमें नींद नहीं आती है।
भोजन का न पचना।
ब्लड सरकुलेशन सही तरह से नहीं होता।
एकदम से ब्लड प्रेशर कम ज्यादा हो जाना।
बिना काम के थकान महसूस होना।
हमेशा उदास रहना, तेज सांस चलना।
हमेशा चिड़चिड़ा रहना।
बेवजह की बातों पर गुस्सा होना।
सिर दर्द , बदन दर्द जैसा महसूस करना।
आत्मविश्वास कम होना।
बालों का झड़ना व शरीर पर कई तरह के परिवर्तन
इसके अलावा भी कई तरह के लक्षण हो सकते हैं जिन्हें हम नजरअंदाज कर देते हैं।
तनाव के कारण
अस्वस्थ आहार का सेवन
नींद की कमी
बदलती जीवनशैली
वातावरण का प्रभाव आदि कारण है तनाव के
तनाव के लिए होम्योपैथी दवाएं
ADEL 85 को दो चम्मच , आधे कप पानी के साथ सुबह , शाम लें
इस दवा के सेवन के साथ ही व्यायाम करें, संतुलित आहार लें और सुबह ताज़ी हवा में सैर करें ।

Homeopathic Treatment for Toothache

दांत का दर्द
दांत का दर्द एक आम समस्या बनती जा रही है । दन्त का दर्द असहनीय होता है, जिससे न सिर्फ बच्चे बल्कि बुजुर्ग व्यक्ति भी परेशान रहते हैं । इस दर्द में लोग अच्छे से न खाना खा पाते है न बोल पाते है और साथ में चहरे पर सूजन आती है । दांत के दर्द का इलाज थोड़ा मुश्किल हो जाता है. किसी को अपने दांतों के दर्द के बारे में बताया जाए तो नमक के पानी के गरारे और लौंग की सलाह देते हैं ।
दांत दर्द के लक्षण
दांत का दर्द हल्के से गंभीर तक हो सकता है, और यह स्थिर या अस्थायी हो सकता है ।
आप महसूस कर सकते हैं, जैसे-
अपने दांत या गम में या उसके आसपास दर्द या सूजन झुकाव
बुखार
सांस लेने में तकलीफ
जब आप अपने दाँत को छूते हैं या काटते हैं तो तेज दर्द होता है
आपके दांत में या उसके आस-पास कोमलता और चंचलता
गर्म या ठंडे खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों के जवाब में आपके दाँत में दर्दनाक संवेदनशीलता।
जलन या सदमे की तरह दर्द, जो असामान्य है।
दांत में दर्द के कारण
दांत में फोड़ा होना
दांतो की बाहरी परत में कमजोरी
मसूड़ों के रोग के कारण
दांत पीसना
बहुत ज्यादा ठंडा/ गरम खाने से दांतो में संवेदनशीलता
दांतों के दर्द का होम्योपैथिक उपचार
Mercurius soulb 30ch की २ बुँदे, दिन में तीन बार लें (2 बुँदे सवेरे, 2 बुँदे दिन में , 2 बुँदे शाम को)।
Repl 99 की 15 से 20 बुँदे, दिन में तीन बार लें (15 से 20 बुँदे सवेरे, 15 से 20 बुँदे दिन में , 15 से 20 बुँदे शाम को)।
दांतो के दर्द में बताई गयी होम्योपैथिक दवाओं का सेवन करें और दांतो को साफ रखे, स्वस्थ आहार लें, दिन में 2 बार ब्रश करें ।दांत का दर्द
दांत का दर्द एक आम समस्या बनती जा रही है । दन्त का दर्द असहनीय होता है, जिससे न सिर्फ बच्चे बल्कि बुजुर्ग व्यक्ति भी परेशान रहते हैं । इस दर्द में लोग अच्छे से न खाना खा पाते है न बोल पाते है और साथ में चहरे पर सूजन आती है । दांत के दर्द का इलाज थोड़ा मुश्किल हो जाता है. किसी को अपने दांतों के दर्द के बारे में बताया जाए तो नमक के पानी के गरारे और लौंग की सलाह देते हैं ।
दांत दर्द के लक्षण
दांत का दर्द हल्के से गंभीर तक हो सकता है, और यह स्थिर या अस्थायी हो सकता है ।
आप महसूस कर सकते हैं, जैसे-
अपने दांत या गम में या उसके आसपास दर्द या सूजन झुकाव
बुखार
सांस लेने में तकलीफ
जब आप अपने दाँत को छूते हैं या काटते हैं तो तेज दर्द होता है
आपके दांत में या उसके आस-पास कोमलता और चंचलता
गर्म या ठंडे खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों के जवाब में आपके दाँत में दर्दनाक संवेदनशीलता।
जलन या सदमे की तरह दर्द, जो असामान्य है।
दांत में दर्द के कारण
दांत में फोड़ा होना
दांतो की बाहरी परत में कमजोरी
मसूड़ों के रोग के कारण
दांत पीसना
बहुत ज्यादा ठंडा/ गरम खाने से दांतो में संवेदनशीलता
दांतों के दर्द का होम्योपैथिक उपचार
Mercurius soulb 30ch की २ बुँदे, दिन में तीन बार लें (2 बुँदे सवेरे, 2 बुँदे दिन में , 2 बुँदे शाम को)।
Repl 99 की 15 से 20 बुँदे, दिन में तीन बार लें (15 से 20 बुँदे सवेरे, 15 से 20 बुँदे दिन में , 15 से 20 बुँदे शाम को)।
दांतो के दर्द में बताई गयी होम्योपैथिक दवाओं का सेवन करें और दांतो को साफ रखे, स्वस्थ आहार लें, दिन में 2 बार ब्रश करें ।