Safed balon ke lie homeopathy ka chamatkari formula

सफ़ेद बाल
काले लम्बे बाल सुंदरता का प्रतीक है , हर कोई चाहता है उसके बाल काले हों लेकिन आज के युग में देखा जा रहा हैं की सिर्फ बुजुर्ग व्यक्तियों में ही नहीं बल्कि बच्चों में भी बाल सफ़ेद होने की समस्या नजर आने लगी है
लोग अपने बालों को काला रखने के लिए अनेक प्रकार के केमिकल युक्त उत्पाद इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसका प्रभाव न सिर्फ उनके बालों में बल्कि आँखों की रौशनी में भी पड़ता है

सफ़ेद बाल होने के कारण
बालों के सफेद होने के कई कारण होते हैं,जिसमे से कुछ कारण निम्न है :-
बालों का काला रंग हमारे स्कैल्प में यानि कि सिर की खाल में मौजूद एक खास तत्व के कारण होता है,
प्रदूषण भी बालों के सफेद होने का एक मुख्य कारण है
खाने में पोषण तत्वों की कमी के कारण
कई बार बिमारियों के कारण भी बाल सफ़ेद हो जाते हैं
शरीर में विटामिन बी की कमी के कारण भी बालों के सफ़ेद होने की समस्या रहती हैं

सफ़ेद बाल के लक्षण

सफ़ेद बालों के कई लक्षण देखे गए है, जिनमे से कुछ लक्षण निम्न है :-
बाल का नाजुक व बेजान होना
उम्र से पहले ही बाल सफेद हो जाना या बालों में सफेदी आना
बालों का पतला हो जाना
बालों का टेक्सचर ख़राब होना आदि लक्षण

सफ़ेद बाल होने पर होम्योपैथिक उपचार
Jaborandi oil, Jaborandi q और bringraj q को बराबर मात्रा में मिला कर हफ्ते में एक बार बालों में लगाए और हो सके तो रोज लगाए,

इन दवाओं को मिला के लगाने से न सिर्फ आपके बाल काले होंगे बल्कि चमकदार और लम्बे भी होने लगेंगे इन दवाओं के साथ साथ , खाने पीने का ध्यान रखे और फाइबर युक्त भोजन लेने के साथ साथ विटामिन बी की मात्रा खाने में बढ़ाएं

Crack Heels treatment in homeopathy | फटी एड़ियों के लिए दवाए

फटी एड़ियां

फटी एड़िया एक आम परेशानी है परन्तु ये एक दर्दनाक बीमारी बन सकती हैं अगर समय रहते फटी एड़ियों का उपचार नहीं किया जाये तो | इतना ही नहीं फटी एड़ियां अक्सर महिलाओं के लिए शर्मिंदगी का कारण भी बन जाती हैं , फटी एड़ियां जहा एक तरफ शर्मिन्दिगी का कारण बनती हैं, वही दूसरी तरफ इनमे से कभी कभी खून भी निकलने लगता हैं |
यह समस्या पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में अधिक देखी गयी है।परन्तु आजकल ये देखने को मिलता हैं की बरसातों के मौसम से ही एड़ियों का फटना शुरू हो जाता हैं |

फटी एड़ियों के कारण

फटी एड़ियों का मुख्य कारण हैं पैरों की सही देख भाल न कर पाना, समय समय पर पैरों को न धोना, पैरों में चपलों का अधिक प्रयोग करना , नंगे पाव घूमना, गर्मियों के मुकाबले ठंडो में ये समस्या ज्यादा देखी जाती हैं…., आदि कारण फटी एड़ियों के कुछ मुख्य कारण हैं।

फटी एड़ियों के लक्षण :

इन परेशानियों का लक्षण है जैसे
पैरों में लाली , खुजली, सूजन
स्किन का फटना और साथ में त्वचा का रूखा व पतला हो जाना है |
इसके पहले कि दरारें (Cracks ) गहरी हो जाए और उसमे से खून (Bleeding ) आने लगे या दर्द हो, हम सही उपचार से बच सकते हैं |

फटी एड़ियों के लिए होम्योपैथिक उपचार

एड़ियों के फटने पर आप कुछ होम्योपैथिक दवाये इस्तेमाल कर पैरो की सुंदरता को बनाये रख फटी एड़ियों से निजात पा सकते हैं :
Calendula officinalis – Q से फटी एड़ियों को रुई की मदद से साफ करें
No crack cream को फटी एड़ियों में दिन में दो बार प्रयोग करें
Petroleum ३० की ५ बुँदे दिन में ३ बार लें ( ५ बुँदे सवेरे, ५ बुँदे दिन में, ५ बुँदे शाम को )
Natrum Sulp 6x की ४ गोली दिन में ३ बार लें, ( ४ गोली सवेरे, ४ गोली दिन में , ४ गोली शाम को )

इन दवाओं को सही मात्रा व सही समय पर प्रयोग करें साथ ही पाव को साफ रखे और गर्म पानी से धोये हो सकते को चपलों से ज्यादा जूतों का इस्तेमाल करें।

Height Growth

लम्बाई बढ़ाने का होम्योपैथिक उपचार

लम्बा कद हर कोई चाहता है। लम्बे कद का आत्मविश्वास बढ़ाने में एक विशेष योगदान रहता हैं यही नहीं सेना और पुलिस में ऊंचे कद का होना जरूरी माना जाता है। और अगर मॉडलिंग जैसे क्षेत्र में कदम जमाने हों, तो लंबाई बहुत काम आती है। हालांकि सबकी लंबाई अच्छी नहीं होती। लेकिन लंबाई बढ़ाने के लिए बचपन से ही ध्यान रखना चाहिए। लंबाई बढ़ने की औसत आयु लड़कियों में लगभग 18 वर्ष और लड़कों में 24 साल मानी जाती हैं।
व्यक्ति के शरीर में लम्बाई को बढ़ाने में सबसे अधिक योगदान ह्यूमन ग्रोथ हार्मोन का होता है।

लम्बाई न बढ़ने के कारण

लम्बाई न बढ़ने के अनेक कारण है, जिनमे से कुछ कारण निम्न हैं :
अनुवांशिक कारण
उचित आहार व पोषण की कमी
हार्मोन्स का विकास
जरूरत से ज्यादा भार नियमित उठाने के कारण

लम्बाई न बढ़ने के लक्षण
लम्बाई न बढ़ने का एक ही लक्षण देखा गया है :-
आयु के अनुसार लम्बाई न बढ़ना

जानते है समय रहते लम्बाई बढ़ाने के लिए होम्योपैथिक उपचार
Syphilinum 1m की ३ पुड़िया, १० -१० मिनट के अंतर से( एक दिन लेनी हैं बस इसके बाद इसको नहीं लेना हैं )।
Hi tex की २ गोली, दिन में ३ बार (२ गोली सवेरे, २ गोली दिन में, २ गोली शाम को )
Acth 30, की २ बुँदे, दिन में ३ बार (२ बुँदे सवेरे, २ गोली दिन में, २ गोली शाम को )
Calcarea Phos. 6x की ४ गोली , ३ बार (४ गोली सवेरे, ४ गोली दिन में, ४ गोली शाम को )
Bryta Carb. 1m की ३ पुड़िया १० -९० मिनट के अंतर से एक दिन लेनी है (Syphilinum 1m के ९० दिन बाद )
Thuja 1m की ३ पुड़िया १० -९० मिनट के अंतर से एक दिन लेनी है ( Bryta Carb. 1m लेने के ९० दिन बाद )
पुड़िया लेने वाले दिन बाकी दवाओं का सेवन न करें।
इन दवाओं को समय पर और सही मात्रा में लें, साथ ही खाने में सही पोषण तत्वों को शामिल करें।

Constipation

Constipation
कब्ज में मलत्याग में परेशानी होने लगती है और कब्ज में व्यक्ति का पाचन तंत्र ख़राब हो जाता हैं, जिसके कारण पाचन होने में समस्या होने लगती हैं हालांकि ये कोई गंभीर समस्या नहीं हैं, मल त्याग की गति हर एक व्यक्ति में अलग अलग होती हैं।
इसमें व्यक्ति को मल त्याग में मुश्किल और अधिक कठिनाई होने लगती हैं।

कब्ज के कारण

कब्ज के कई कारण हो सकते हैं। जानते है कब्ज के कुछ निम्न कारण :

शरीर में पानी की कमी।
फाइबर युक्त भोजन का अभाव।
शारीरिक श्रम में कमी, मेहनत न करना, आलस्य करना।
जरुरत से ज्यादा दवाओं का सेवन करना।
व्रत उपवास करने के कारण या बिना भूख के भोजन करने के कारण।
भोजन खूब चबा-चबाकर न करना अर्थात् जबरदस्ती भोजन ठूँसना। जल्दबाजी में भोजन करना।

कब्ज के लक्षण

सांसों से बदबू।
मुँह का स्वाद खराब होना , जीब मोटी या जीब में सफ़ेद परत या मटमैली होना।
उलटी या मतली आना।
अधूरे मलत्याग की भावना।
पेट साफ़ नहीं होने के कारण चेहरे में दाने।
पेट में दर्द या सूजन होना, आदि लक्षण कब्ज में देखे जाते हैं।

कब्ज के लिए होम्योपैथिक उपचार:

Bryonia alba 30 की ५ बुँदे दिन में २ बार, (५ बुँदे सुबह खली पेट, ५ बुँदे शाम को खाना खाने के बाद )
Bio-combination-4 , की ४ गोली दिन में ३ बार, (४ गोली सुबह, ४ गोली दिन में , ४ गोली शाम को )
Blooume no. 35, २ गोली दिन में ३ बार ( २ गोली सुबह, २ गोली दिन में, २ गोली शाम को )

कब्ज होने पर इन होम्योपैथिक दवाओं का सेवन करें और साथ ही नियमित पानी पिए।

Tinnitus

टिनिटस जिसका मतलब है, कानो का बजना , जिसमे कान में आवाज सुनाई देती है जैसे कान में घंटी बजने की आवाज सुनाई देना जब कोई आवाज बज भी नहीं रही होती है लेकिन ये आवाज परेहान करने वाली फुंकार, सीटी, या भिनभिनाने की तरह भी हो सकती है ।टिनिटस किसी भी उम्र के लोगों में हो सकती हैं । इसे रक्तवाहिनियों की समस्या या उम्र के साथ सुनने की शक्ति क्षीण होने से जोड़कर देखा जा सकता है।
टिनिटस के कारण सुनने की क्षमता कम हो जाती है

टिनिटस के कारण
टिनिटस का कोई स्पष्ट कारण निकलना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन इनके कुछ सामान्य कारण निम्न है :
कान की अंदुरुनी चोट या पस भरना
कान के परदे में छेद होना
कान के अंदर संक्रमण या सर्दी जुखाम के कारण

टिनिटस के लक्षण
कानों में सि‍सकारी, दहाड़ जैसी आवाजें बजना
कानों का बजना एवं आवाज का कानों में गूंजते रहना, यह आवाजें समस्या की गंभीरता के अनुसार कम या ज्यादा तीव्रता लिए होती हैं।
कान में शोर इतनी तेज होना की, काम करने में भी समस्या होने लगे

टिनिटस का होम्योपैथिक उपचार

टिनिटस के लिए जानते है कुछ होम्योपैथिक दवाएं
Chamomilla 1000 or 1m शुगर मिल्क के साथ ३ पुड़िया , 10-10 मिनट के अंतर से ३ बार
Aconitum Napellus 30, 2 बुँदे, दिन में 3 बार (10-15 दिन तक)
Chenopodium Q, की 10-15 बुँदे , दिन में ३ बार
Five phos की 4 गोली , दिन में ३ बार
Thiosinaminum 3x की २ गोली , दिन में ३ बार
टिनिटस होने पर इन दवाओं को समय पर और सही मात्रा में लें

Stye

इस रोग में आंखों की पलकों के ऊपर या नीचे एक तरफ फुंसियां हो जाती है अर्थात आंखों को नमी देने वाली ग्रन्थि में छोटी सी फुंसी हो जाती है जिसे अंजनी या गुहेरी कहते हैं। जब तक इसका प्रभाव आंखों पर नहीं होता है तब तक इसका दृष्टि पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है।

कारण : यह रोग अधिकतर बैक्टीरिया के कारण होता है। सर्दी लगना एवं शरीर में अधिक कमजोरी होना आदि कारणों से यह रोग होता है।

लक्षण : जब यह रोग हो जाता है तो पलक पर लाली आ जाती है, दर्द होने लगता है और असहनीय सूजन हो जाती है। इस रोग के होने के कुछ दिनों बाद इसके फोड़े पर मुंह निकल आता है और मवाद निकल जाता है। पलकों पर खुजली भी होती है।
साथ ही इनके कुछ अन्य लक्षण भी है जैसे :-
आंखे झपकने में दर्द
जलन
सूजन
छूने में दर्द
प्रभावित छेत्र से पस निकलना आदि।

जानते है गुहेरी के लिए कुछ होम्योपैथिक दवाएं :
गुहेरी का होमियोपैथी में पूर्ण रूप से इलाज उपलब्ध है और साथ ही होम्योपैथिक उपचार के बाद गुहेरी के दोबारा होने की सम्भवना भी कम हो जाती है. जानते है गुहेरी के लिए होम्योपैथिक दवाये :
Staphysagria 1m की ४ पुड़िया बनवा लें , और इनको 10-10 मिनट के अंतर से लें ।
Pulsatilla Nigricans 200 की 5 बुँदे, पांच साल से ऊपर के लोगों के लिए, और २ बुँदे छोटे बच्चों के लिए एक बार दें , सवेरे उठते उठते ।
Belladonna 30, की 2-2 बुँदे , दिन में ३ बार लें, (२ बुँदे सवेरे, २ बुँदे दिन में , और २ बुँदे शाम को )
REPL 96 ,15-20 बुँदे दिन में ३ बार आधे कप पानी में मिला कर लें , (15-20 बुँदे सवेरे,15-20 बुँदे दिन में , 15-20 बुँदे शाम को )।

गुहेरी होने पर बताई गयी होम्योपैथिक दवाइयों का सेवन करें ,इन दवाओं से आपको इस रोग में बेहद फायदा होगा साथ ही धूल मिट्टी से अपने आँखों को बचाये और गुनगुनगे पानी से प्रभवित जगह को सेकते रहें ।

Hoarsen

गला बैठना

गले का बैठना वैसे तो एक आम समस्या है अक्सर इस परेशानी में लोग ज्यादा ध्यान नहीं देते गले के बैठने के कारण गले में दर्द खराश जैसी समस्या आती है हलाकि गले दर्द की समस्या ज्यादा समय के लिए नहीं रहती पर इसका उपचार करा लेना चाहिए क्योंकी गले में खराश कई बड़ी बिमारियों का कारण बन सकती है गले के बैठने पर अकसर आपको बोलने में परेशानी का सामना करना पड़ता है इतना ही नहीं आपको खाना निगलने में भी गले में दर्द होता है

गले बैठने के कारण :

गले के बैठने के वैसे तो कई कारण है, लेकिन कुछ सामान्य कारण निम्न है :-

टॉन्सिल या टॉन्सिल बढ़ने के कारण गला बैठना
जोर से चिल्लाने के कारण गला बैठना
ठंडे के कारण गला बैठना
ठंडे पेय प्रदार्थ, शराब के साथ अधिक मात्रा में बर्फ का सेवन, धूम्रपान , और अधिक तेल ,मसाले वाले खाने का सेवन करने के कारण
ये कुछ सामान्य कारण है जिससे गले बैठने की समस्या

गला बैठने के लक्षण

गला बैठना वैसे तो अपने आप में एक लक्षण है ,परन्तु इसके कुछ सामान्य लक्षण है जैसे :
मुँह से बदबू आना
साँस लेने में दिक्कत होना
निगलने में परेशनी
गले में गाँठ बनना
बोलने में गले में दर्द होना
आवाज में घरघराहट
गले में बलगम जमना
बलगम में खून
आदि लक्षण गले बैठने में दिखाई पड़ते है।

गले बैठने का होम्योपैथिक उपचार :
Aconitum Napellum 30ch की 5-5 बुँदे, दिन में 3 बार (5 बुँदे सवेरे, 5 बुँदे दिन में, 5 बुँदे शाम को ) 1 हफ्ते तक लें ,
एक हफ्ते बाद से,Causticum 30ch, की 5 बुँदे, दिन में ३ बार , 5 बुँदे सवेरे, 5 बुँदे दिन में, 5 बुँदे शाम को),
साथ में , Ferrum Phos. 6x और Kali Mur. 6x की 6-6 गोलिया मिला कर दिन में ३ बार लें

अगर गला बैठ रहा हैं तो , होमियोपैथी की कुछ दवाइयां लें कर आप गले बैठने की समस्या से छुटकारा पा सकते है।

Parkinson Disease

पार्किंसन रोग केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र का एक ऐसा रोग है जिसमें रोगी के शरीर के अंग कंपन करते रहते हैं। पार्किंसन का आरम्भ आहिस्ता-आहिस्ता होता है। पता भी नहीं पड़ता कि कब लक्षण शुरू हुए। अनेक सप्ताहों व महीनों के बाद जब लक्षणों की तीव्रता बढ़ जाती है तब अहसास होता है कि कुछ गड़बड़ है। लेकिन घबराइए नहीं क्‍योंकि आयुर्वेदिक की मदद से पार्किंसंस के प्राकृतिक उपचार में मदद मिलती है, जिससे बीमारी से छुटकारा पाकर आपका शरीर पूरी तरह स्‍वस्‍थ हो जाता है। यह एक ऐसा इलाज है जिसमें पूरे शरीर का इलाज किया जा सकता है। आयुर्वेदिक उपचार तथ्‍य पर आधारित होता है, जिसमें अधिकतर समस्‍याएं त्रिदोष में असंतुलन यानी कफ, वात और पित्त के कारण उत्‍पन्‍न होती है।

पार्किंसन रोग के लक्षण

इस रोग के कोई विशेष लक्षण नहीं हैं अलग अलग व्यक्तियों में इसके अलग अलग लक्षण देखने को मिलते हैं, कुछ सामान्य लक्षण हैं
कम्पन
कठोर मांसपेशियां
लिखावट में परिवर्तन
असंतुलन व बिगड़ी हुई मुद्रा
आवाज में बदलाव
कार्य करने की छमता में कमी आना

पार्किंसन रोग के कारण

इस रोग के कोई विशेष कारण नहीं है , परन्तु कुछ कारक निम्न है
बढ़ती उम्र
महिलाओ की तुलना में ये पुरुषों में अधिक पाया जाता हैं
अनुवांशिक कारण
वातावरण व पर्यावरण से सम्बंधित कारण

पार्किंसन रोग के लिए होम्योपैथिक उपचार

Gelsemium Sempervirens 1000 या 1m को शुगर मिल्क पॉवडर के साथ ३ पुड़िया बनवा लें और 10 -10 मिनट के अंतर से ३ बार लें,
5 phos 6x की गोली दिन में ३ बार ।
Avena sativa Q आधे कप पानी में 20 बुँदे, दिन में ३ बार (खाना खाने से पहले )।

पार्किंसन रोग होने पर इन होम्योपैथिक दवाओं का उपयोग कर आप इस रोग को काफी हद तक कण्ट्रोल कर सकते है।

Anemia

एनीमिया

जब किसी कारण से शरीर में खून की मात्रा कम हो जाती है या खून में लाल रक्तकणों की कमी हो जाती है तब रोगी के शरीर में खून की कमी हो जाती है। जब कोई रोगी इस रोग से पीड़ित होता है तो शरीर में खून की कमी के कारण चेहरा पीला या सफेद पड़ जाता है, उसका शरीर कमजोर और पतला हो जाता है, रोगी को भूख नहीं लगती, सिरदर्द रहता है, चक्कर आते हैं, दिल की धड़कन तेज हो जाती है तथा कमजोरी के कारण रोगी कोई कार्य नहीं कर पाता तथा उसे चलने-फिरने में भी कठिनाई होती है। किसी रोग आदि में शरीर से खून निकल जाने पर यह रोग हो जाता है। स्त्रियों में रक्तस्राव या मासिकधर्म के समय खून आने पर भी खून की कमी हो जाती है। यदि किसी रोगी के शरीर में खून का स्वभाविक परिमाण कम हो जाए या खून में लाल कणों की मात्रा कम हो जाए या ठीक प्रकार से शरीर में खून नहीं बन पाता है। ऐसे कारणों से शरीर में खून की कमी हो जाती है जिसे रक्त-स्वल्पता या एनीमिया कहते हैं। हीमोग्लोबीन का कार्य शरीर के विभिन्न भागों में ऑक्सीजन का पहुंचाना है। जब किसी कारण से खून में हीमोग्लोबीन की मात्रा जरूरत से अधिक कम हो जाती है तो उसे एनिमिया कहते हैं।

एनिमिया के कारण
सबसे प्रमुख कारण लौह तत्व वाली चीजों का उचित मात्रा में सेवन न करना।

* किसी भी कारण रक्त में कमी, जैसे-
-शरीर से खून निकलना (दुर्घटना, चोट, घाव आदि में अधिक खून बहना)
– शौच, उल्टी, खांसी के साथ खून का बहना।
– माहवारी में अधिक मात्रा में खून जाना।
* मलेरिया के बाद जिससे लाल रक्त करण नष्ट हो जाते हैं।
* पेट के अल्सर से खून जाना।
* पेट के कीड़ों व परजीवियों के कारण खूनी दस्त लगना।
* बार-बार गर्भ धारण करना।

एनीमिया के लक्षण
* त्वचा का सफेद दिखना।
* कमजोरी एवं बहुत अधिक थकावट।
* जीभ, नाखूनों एवं पलकों के अंदर सफेदी।
* बेहोश होना।
* चक्कर आना- विशेषकर लेटकर एवं बैठकर उठने में।
* हृदयगति का तेज होना।
* सांस फूलना।
* चेहरे एवं पैरों पर सूजन दिखाई देना।

एनीमिया होम्योपैथिक उपचार :
Bio combination-1 की 4 tablet, दिन में 3 बार साथ ही ferrum Met 3x, की 2 tablet, दिन में तीन बार
Biofungin 5ml, दिन में तीन बार बड़ों के लिए, 2.5 ml, दिन में तीन बार बच्चो के लिए
Ferrumsip, 5ml दिन में तीन बार बड़ों के लिए, 2.5 ml, दिन में तीन बार बच्चो के लिए

खून की कमी होने पर रोगी को विटामिन बी-12 युक्त आहार लेना चाहिए, हरी सब्जियां, अखरोट, किशमिश, स्ट्राबेरी, अण्डा, गेहूं, खजूर, दूध और दूध से बनी चीजें लेना चाहिए। कच्ची सब्जियों का रस, पालक, गाजर, मूली आदि का सेवन करना एनीमिया रोग में अधिक लाभकारी होता है। चाय, कॉफी, ठण्डे पेय आदि का सेवन करना हानिकारक होता है। मासिक धर्म अधिक मात्रा में आना। लौहतत्व युक्त दवाइयां लेने से उल्टी, खून मिला हुआ दस्त, थकान आदि उत्पन्न होता है। शीरा रक्तकणों को शक्तिशाली बनाता है।

Homeopathic Treatment for Jaundice

पीलिया रोग में रोगी के शरीर की त्वचा पीली हो जाती है, आंखों के अन्दर का सफेद भाग तक भी पीला हो जाता है।
आंखों और रोगी की त्वचा से पता चलता है कि उसे पीलिया हुआ है। ये पीलापन खून में मौजूद बिलरूबिन की मौजूदगी के कारण होता है। ये तत्व लाल रक्त कोशिकाओं के नष्ट होने से बनता है। लक्षण- पीलिया रोग के लक्षणों में रोगी की त्वचा, आंखे, नाखून पीले रंग के हो जाते हैं। रोगी पेशाब करता है तो वह भी बिल्कुल पीले रंग का आता है। यह लक्षण नन्हें-नन्हें बच्चों से लेकर 80 साल तक के बूढ़ों में उत्पन्न हो सकता है।

पीलिया के कारण :
पीलिया के कई कारण है, जिनमे से कुछ प्रमुख कारण हैं :
बाजार की गन्दी चीजें खाना
किसी बीमार व्यक्ति का झूठा खाना व पिने से
खून की कमी होने से
लिवर की कमजोरी से

पीलिया के लक्षण :

आंखें पिली पढ़ जाती हैं
चेहरे के साथ शरीर भी पीला-पीला हो जाता हैं
नाख़ून पर पीलापन आ जाता हैं
भूख नहीं लगती हैं साथ ही उल्टियां होती हैं
बुखार व पेट में दर्द भी होता हैं
पेशाब हलके गहरे रंग की आने लगती हैं आदि यह सभी पीलिया रोग के लक्षण हैं.
हाथों में खुजली चलना
बिलिरुबिन का स्तर खून में बढ़ने से, त्वचा, नाखून और आंख का सफेद हिस्सा तेजी से पीला होने लगता है।
लिवर की किसी भी अन्य परेशानी की ही तरह, पीलिया में भी स्पष्ट तौर पर लिवर में तकलीफ होती है। एक तरह से असुविधाजनक खुजली होती है।
अक्सर फ्लू-जैसे लक्षण विकसित होते हैं और मरीज को ठंड लगने के साथ ही या उसके बिना भी बुखार चढ़ने लगता है।

पीलिया का होम्योपैथिक उपचार :
Hepatica 6ch , 2 बुँदे , दिन में 3 बार ( 2 बुँदे सवेरे,2 बुँदे दिन में,2 बुँदे शाम को ) सात दिन के तक लें
Liv-Card, को आधे ढक्कन , दिन में तीन बार, खाने से पहले
Liv-Card tablet, 4 गोली , दिन में तीन बार
इन दवाओं के साथ , पीलिया रोग में रोजाना गन्ने का रस पीना बहुत ही लाभकारी रहता है क्योंकि गन्ने के रस को पीलिया रोग का बहुत बड़ा दुश्मन माना जाता है। पीलिया के रोगी को रोजाना ताजी सब्जियों का 2-3 गिलास रस पीना चाहिए। रोगी को, दूध, पनीर और मांसाहारी चीजों का सेवन नहीं कराना चाहिए। पीलिया के रोगी को शराब नहीं पीनी चाहिए। रोगी को बहुत ज्यादा मात्रा में ठण्डा पानी पीना चाहिए। गुनगुना पानी का सेवन करें ।